अपना -अपना निष्कर्ष

August 13, 2018

 

 

 

जीवन के लगभग पचास पतझडो को देख चुकी हू   पतझङ क्यू कह रही हू?    क्यूकि पतझङ के बिना तो बसंत कभी आया नही     लेकिन पता नही क्यो इतनी महत्वपूर्ण बात को किसी ने कभी समझाया ही नही खैर,  इतने पतझङो और बसंतो के दौरान मैने  पाया कि तमाम कवियो, लेखको और साहित्यकारो ने हमेशा ही समाज मे स्त्री के जीवन के दयनीय पहलू को बढचढ कर बताया है  अधिकतर ने स्त्री को अबला और किसी किसी ने दुर्गा स्वरूप का गुण गाया है।पुरुष को स्वयंभू,सर्वे सर्वा दिखाया है।और उसके जीवन के संघर्ष को पर्दे के पीछे छिपाया है।आइये मिलकर पुरुष की स्तिथि पर एक नजर डालते है और फिर कुछ निष्कर्ष निकालते है।जन्म के साध ही घर वालो की आकान्क्षा बढ जाती है।कि खानदान का चिराग है,कुल दीपक है और इसी के साथ अनकही एक जिम्मेदारी हा जिम्मेदारी उसके सिर मढ दी जाती है।फिर पढाई का बोझ इस मूक जिम्मेदारी के साथ कि अच्छी नौकरी  मिलेगी तभी तो उठा पायेगा जिम्मेदारी,और बटायेगा घर के बोझ मे हाध,फिर जैसे तैसे नौकरी लगती है।उसकी मारा मारी चलती है।और फिर वो हो जाता है कुर्बान,शादी करके उसकी बंद कर दी जाती है जुबान,यदि बहुत पुण्य कि ये हो तो मिल जाती है पत्नी अच्छी,और कहा जाता है कि लङकी बङी सुशील है,साक्षात् अन्नपृर्णा।और यदि किस्मत ने साथ न दिया तो बेबस पति,पत्नि के रंग देखने को मजबूर अब न तो वह रो सकता है,न कुछ कह सकता है।गले मे फंसी फास को आजन्म झेलता है।लोग कहते है कैसा लङका है जिससे अपनी पत्नी नही सम्भलती,बङा नाकारा है। ये तो सिर्फ वे अनुभव है जो बाहर से दिखते है यदि कोई शक्शियत लङको के दिल मे झाकेगी,तो ये फेहरिस्त काफी लंबी पायेगी।इन्ही हालातो से गुजरते हुए,पुरूष की स्तिथि का अंदाजा लगाया जा सकता है और पुरूष की लाचारगी पर अपना अपना निष्कर्ष निकाला जा सकता है। 

 

नीता गुप्ता

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